टिड्डी अटैक

Tiddi Attack

जैसा कि आप कुछ ही माध्यमों से सुन पा रहे होंगे कि हमारे देश पर एक बहुत बड़ा हमला हुआ है. Tiddi attack (Locust Attack)और ये हमला किसी इंसानी दिमाग का फितूर नहीं है कोरोना, अम्फान के बाद एक के बाद एक तीसरा वार किया गया है प्रकृति की ओर से। चलिए विस्तार से समझते हैं की क्या है टिड्डी अटैक :

दोस्तों टिड्डियाँ दो प्रकार की होती हैं, एक जो अकेला रहना पसंद करती हैं और उनसे हम सभी परिचित भी हैं क्योंकि गाहे बगाहे हमें दिख ही जाती हैं। दुसरे प्रकार की टिड्डियाँ थोड़ी पारिवारिक होती हैं, हमेशा एक विशाल झुण्ड में चलती हैं और अपने सामने पड़ने वाले हर एक हरे भरे पेड़ या पौधे को चट कर जाती हैं।

इस वक़्त भारत में दुसरे प्रकार की Tiddi attack (Locust Attack) हुआ है इससे पहले भी दिसंबर में हुआ था मगर वो इतना भयावह नहीं था जबकि वैज्ञानिकों का कहना कि जून के महीने में इससे भी बड़ा हमला हो सकता है। इसी कड़ी में हम आपके मन में उठने वाले कुछ सवालों का उत्तर लेकर आये हैं:

 

 

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कोरोना के बाद अब Tiddi attack ( Locust Attack )

 

1. टिड्डियों  का  दल आया कहाँ से है  ?

दोस्तों इन Tiddi attack मूल रूप से पूर्वी अफ्रीका के रेगिस्तानी इलाके से निकला है, जो यमन, ओमान और पाकिस्तान होते हुए राजस्थान के रास्ते भारत में प्रवेश कर गया। इनके चलने की दिशा हवाओं पर निर्भर करती है, पिछले साल ये दल लाहौर की तरफ चला गया था क्योंकि तब हवाएं उस तरफ चल रही थी मगर इस बार पश्चिमी विक्षोभ के कारण हवाएं पश्चिम से पूरब की और लगातार चल रही हैं जिसकी वजह से ये टिड्डी दल भी भारत चला आया है।

पश्चिमी विक्षोभ के ठण्ड के मौसम के गुजर जाने के बाद भी बने रहना कोई मामूली बात नहीं हैं, साधारणतया ये फ़रवरी के पहले पखवारे तक शांत हो जाते हैं मगर इस बार अभी तक सक्रीय हैं इसलिए इस गर्मी के मौसम में भी आपको बारिश के मजे मिल पा रहे हैं।

 

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2 . Tiddi attack से क्या नुकसान हो रहा है ?

दोस्तों इन टिड्डियों का एक दल कम से कम 4 – 5 वर्ग किलोमीटर बड़ा है और हर एक वर्ग किलोमीटर में 4 करोड़ टिड्डियाँ हैं जो एक दिन में 35000 लोगों का खाना चट कर रही हैं। ऐसे ना जाने कितने दल हैं, जो भारत के 6 राज्यों के 44 जिलों में फ़ैल चुके हैं। राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब और महाराष्ट्र इसकी जद में आ चुके हैं।

हवाओं की दिशा के हिसाब से ये भी अपने रास्ते बदल रहे हैं, झुण्ड में होने की वजह से इनकी प्रजनन दर भी बहुत तीव्र है इस वजह से लगातार ये झुण्ड और बड़े होते जा रहे हैं। अकेले मध्य प्रदेश में 8500 करोड़ के कीमत की मूंग की फसल कटाई के लिए तैयार कड़ी है तथा कपास की तो अभी बुआई ही हुई है।

अब इसी से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस आपदा के बाद हमारे किसानों के साथ क्या होने जा रहा है? जो पहले से ही Lockdown से हुई आर्थिक समस्या से घिरे हुए हैं।

3. सरकारें Tiddi attack के रोकथाम के लिए क्या कर रही हैं ?

हमारे देश में 1946 से ही LWO यानि कि Locust Warning Organization सक्रीय है क्योंकि ये समस्या नई नहीं है मगर परेशान करने वाली बात ये है कि आज से पहले ये समस्या इतनी विकराल कभी नहीं हुई।

इस बार भी इस organization ने समय रहते ही इसके बारे में चेतावनी जारी कर दी थी मगर सरकारें आँख मूंदकर सोती रहीं, अब कहीं जाकर कीटनाशकों का छिड़काव शुरू हुआ है और सरकारी डाटा के हिसाब से अबतक 46000 हेक्टेयर भूमि पर छिड़काव हो चुका है।

पर तो ये आंकड़े बड़े लगते हैं मगर हमारा देश बहुत बड़ा है, ये 46000 हेक्टेयर से कुछ नहीं होने वाला। लोग खुद ही थाली बजाकर इन्हें अपने खेतों से उदा रहे हैं, कुछ गांवों में तो DJ बज रहे हैं, क्योंकि तेज़ आवाज़ टिड्डियों को परेशान करती है और वो वहां से दूसरी तरफ उड़ जाती हैं।

Locust Warning organisation
Source:-https://www.drishtiias.com/

 

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4. Tiddi attack को प्राकृतिक हमला क्यों कहा जा रहा है ?

असल बात यही है, टिड्डियाँ सदियों से इस धरती पर हैं और खेतों में उनके झुण्ड का आना एक प्राकृतिक घटना ही है, वो खाना ढूंढने निकली हैं उन्हें नहीं पता कि लोग इससे पैसा कमाते हैं। इंसान ने अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते प्रकृति के बहुतेरे नुकसान किये हैं।

कोरोना के बाद Tiddi attack
Source:-https://twitter.com/LocustIndia/status/1235767988147695618/photo/1

यहाँ पर इस समस्या का कारण है खाद्य श्रृंखला का नष्ट होना। मोबाइल टावर से निकला रेडिएशन इंसानो के दिमाग पर कितना फर्क डालता है ये तो पता नहीं, हाँ ये ज़रूर पता है कि इसने कई सारे पक्षियों की प्रजातिओं को विलुप्त कर दिया है। हमारे आपके घरों में दिखने वाली गौरैया ही अब कितनी बार दिखती है आपको ? उनके लुप्त होने का बस एक ही कारण है और वो है मोबाइल टावर।

हम सभी जानते हैं की पक्षी प्रजनन के लिए पलायन करते हैं उस जगह पर जहाँ उन्हें अनुकूल वातावरण मिले और ऐसा करते हुए वो कई देश लांघ जाते हैं, मगर वो ऐसा कैसे कर पाते हैं क्या आपको पता है?? नैसर्गिक दिशाज्ञान की वजह से। यानि कि उन्हें पैदा होने से पहले से ही पता होता है कि किधर जाना है ?

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अब मोबाइल टावर का रेडिएशन उनकी इस क्षमता को क्षीण कर देता है, जिससे वो सही समय पर सही जगह नहीं पहुंच पाते और ना ही प्रजनन कर पाते हैं, इसलिए धीरे धीरे विलुप्त होते जा रहे हैं। टिड्डी एक कीड़े की प्रजाति है और प्रकृति ने कीड़ों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए पक्षी बनाये जो उन्हें खाकर एक क्षेत्र विशेष तक सीमित कर देते थे, मगर इंसानो ने उस सिस्टम को ही नष्ट कर दिया।

 

तो हुआ ना ये प्रकृति का हमला। अब लाख कीटनाशक छिड़को मगर उस सिस्टम को दोबारा बना नहीं पाओगे। इंसान ने प्रकृति की दी हुई हर एक चीज़ का दुरूपयोग ही किया है और उल्टा उसे नुकसान ही पहुंचाया है। एक बार अगर आप बिना इंसान की धरती की परिकल्पना करेंगे तो पाएंगे कि हर समस्या की जड़ ही इंसान है।

 

पशु पक्षी कभी कोई प्रदूषण नहीं फैलते, गन्दगी नहीं करते फिर भी उनका जीवन चलता है मगर इंसान ने खुद को इतना ज़्यादा दिखावटी बना लिया है कि उसे उसके बिना जीना गवारा नहीं। खैर इसी तरह चलता रहा तो क़यामत के दिन ज़्यादा दूर नहीं हैं और ऐसा मुझे लगता है कि अगर मैं अपनी पूरी उम्र जी पाया तो उस क़यामत को अपनी आँखों से देखूंगा।

 

सादर नमस्कार

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