महंगाई की समस्या या सत्ता का षड़यंत्र _

महंगाई की समस्या या सत्ता का षड़यंत्र ?

मेरा नाम सौरभ है और मैं आपका स्वागत करता हूँ हमारे अपने इस नए आर्टिकल पर।”महंगाई की समस्या और समाधान” आज का हमारा टॉपिक है महंगाई को लेकर जिसपर 1980 के दशक से लोगों का ध्यान खिचना शुरू हुआ।

अब आपके मन में सवाल उठा होगा कि 1980 का दशक ही क्यों उससे पहले भी महंगाई ज़रूर बढ़ती होगी। ये बात भी सच है कि उससे पहले भी महंगाई बढ़ती थी मगर वो इतनी नहीं थी जैसी आज है जिसकी वजह से लोग पूरी की पूरी सरकार ही बदल देते हैं।

महंगाई की समस्या और समाधान

अगर ज़रा सा गौर करेंगे तो पाएंगे की हमारे यहाँ हिंदी फिल्म जगत की जो फिल्मे बनती थी उनमे भी ये पैटर्न था। 1970 के दशक या उससे पहले की फिल्में गरीबी पर आधारित होती थीं, जहाँ लोगों के पास कमाई के ज़रिये सीमित होते थे और उसका नायक किसी तरह से साधारण सी ज़िन्दगी ही बसर करता था मगर खुश रहता था।

अब ज़रा 1972 के बाद की फिल्मों की लिस्ट उठाइयेगा तो पाएंगे कि उसके बाद से ही महंगाई को लेकर ना जाने कितनी ही फिल्में बनी जिनमे ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ जैसी कालजई फिल्म शामिल है जो कि 1974 में परदे पर प्रदर्शित हुई थी।

मैं यहाँ फिल्मों का उदाहरण इसलिए ले रहा हूँ क्योकि अगर किसी कालखंड को समझना है तो उस कालखंड में बना साहित्य पढ़ना पड़ता है।फिल्म भी एक साहित्य है जिसे हम डिजिटल फॉर्म में प्रयोग करते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि फिल्मे समाज का आईना होती हैं।

 महंगाई क्या होती है ?

क्या आपको सच में पता है कि महंगाई के बढ़ने का मूल कारण क्या होता है ?

क्या आपको पता है महंगाई क्यों बढ़ती है ?

 

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क्या आपको पता है महंगाई के बढ़ने का असल दोषी कौन है ?

क्या आपको है कि महंगाई बढ़ने के कैसे कैसे विपरीत प्रभाव पड़ते हैं आपकी ज़िन्दगी में ?

चलिए आज के इस सफर महंगाई की समस्या को शुरू करते हैं।

जब चीज़ों के दाम बढ़ते हैं और कमाई घटती या स्थिर रहती है तो उस दशा को महंगाई बोला जाता है। महंगाई के बढ़ने का एकमात्र कारण है नए नोटों की बेधड़क छपाई। अब आप बोलेंगे उससे तो लोगों के पास पैसे बढ़ जायेंगे तो उसका महंगाई से क्या लेना देना ?

इसके लिए मैं आपको एक छोटा सा उदाहरण देकर समझाता हूँ, मान लीजिये आपके पास 100 रुपये हैं और 10 सेब हैं तो इस हिसाब से एक सेब कितने का हुआ ? आप बोलेंगे 10 रुपये उसमे क्या बड़ी बात।

 

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अच्छा अब एक काम करते हैं मैंने 100 रुपए के नए नोट छापे और आपको दे दिए अब आपके पास कुल रूपए हो गए 200,मगर सेब उतने ही हैं, अब ज़रा बताइये कि एक सेब की कीमत क्या होगी ?

जी हाँ आप सही सोच रहे हैं, पूरे 20 रुपये। यानि कि सेब का दाम बढ़ कर दोगुणा हो गया।

जो लोग कॉमर्स से पढ़े हैं उन्हें ये समझने में आसानी हुई होगी, मगर ये कोई इतना कठिन नहीं था। जब आपकी चीज़ों की संख्या स्थिर रहती है मगर पैसे बढ़ जाते हैं तो उसी के हिसाब से हर एक इकाई का मूल्य बढ़ जाता है। और ये बात सब पर लागू होती है, चाहे वो एक इंसान हो या एक राष्ट्र।

1972 में अमेरिका के राष्ट्रपति Richard Nixon ने डॉलर पर से Gold Standerd रातों रात ख़त्म कर दिया। अब ये Gold Standard क्या होता है?

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विश्व में एक नियम था कि जिस राष्ट्र के रिज़र्व में जितना सोना होता था उसको उस सोने की वैल्यू के हिसाब से ही नोट छपने की अनुमति थी, जो उसकी क़र्ज़ नीति के आड़े आ रही थी। जिसकी वजह से नए बिजनेस को क़र्ज़ देने के लिए नया पैसा नहीं होता था।

बैंकों में जो भी पैसा होता था अगर किसी ने लोन के रूप में ले लिया तो वो तब तक नए किसी व्यक्ति को लोन नहीं दे सकते थे, जबतक वो पैसा वापस नहीं आ जाता या और कोई व्यक्ति अपने नोट वहां जमा नहीं करवा देता था। इस एक कदम से उन्होंने ये समस्या तो ख़त्म कर दी मगर एक नई समस्या पूरे विश्व को बांटी जिसे महंगाई कहते हैं।

उनकी इस नीति को बाकि देशों ने भी अपनाया और धड़ाधड़ नोट छापने शुरू कर दिए जबकि वस्तुओं में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। फलस्वरूप, भारत में महंगाई दर जो कि 1971 में 3% थी अचनाक से बढ़कर 1974 में 28% हो गई। वर्तमान समय में ये 8.5% के करीब है।

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महंगाई के बढ़ने का असल दोषी सत्ता में बैठी हुई वो हर सरकार है जो नोट छापती है। आज के बाद अगर कोई आपसे बोले कि उनको वोट देना क्योकि वो महंगाई कम कर देंगे, तो ज़रा पूछ लीजियेगा कि नोट छापना बंद कर दिए क्या ?

महंगाई का समाधान

ज़ाहिर है जब महंगाई बढ़ेगी तो आपकी जेब तो ढीली होनी ही है। रोज़मर्रा की चीज़ों में आपके कमाए हुए पैसे ज़्यादा खर्च होंगे, आपकी बचत पर भी इसका विपरीत असर होता है जिसे मैं अपने अगले आर्टिकल में विस्तार से बताऊंगा।

आपकी सालाना आय बढ़ने का भी कोई ख़ास असर नहीं होता। इस सबके बीच में लोग अपने न्यूट्रिशन पर कम ध्यान देते हैं, जिसकी वजह से बीमारियां लगती हैं।

इससे उनकी सेहत का तो नुकसान होता ही है साथ ही बचत भी इलाज के खर्च में निकल जाती है। एक कहावत है कि पहले इंसान पैसे कमाने के लिए सेहत खो देता है, फिर सेहत कमाने के लिए पैसे। और आजकल के समय में ऐसा 90% लोगों के साथ हो रहा है।

क्या आपको पता है महंगाई के बढ़ने का असल दोषी कौन है ?

जिसका कारण है कि वो जिस पैसे को बचाने के लिए दिन रात बिना अपनी सेहत की परवाह किये लगे हुए हैं वो पैसा तो महज़ एक छलावा है, जिसकी खुद में कोई वैल्यू ही नहीं है। जिस 2000 के नोट को हम सीने से लगाए रखना चाहते हैं वो सिर्फ एक टॉयलेट पेपर ज़्यादा कुछ है ही नहीं।

क्योंकि, जिसे तुम धन समझ के कमा रहे हो, फिर बचा रहे हो उसे वे दिन रात छाप रहे हैं। मेरी नज़र में इन कागज़ के नोटों की कोई वैल्यू नहीं है क्योकि ये असली धन नहीं हैं।

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असली धन तो खुद में वैल्यू रखता है, इन कागज़ के नोटों का वैल्यू सिर्फ तबतक है जबतक लोगों के मन में ये विश्वास बना हुआ है कि ये धन है, जिस दिन वो विश्वास ढहेगा उसदिन इन टॉयलेट पेपर्स की औकात सबके सामने होगी और वो दिन दूर नहीं है।

क्या आपको पता है? 1792 जबसे डॉलर एक मानक करेंसी के रूप में चलना शुरू हुआ है, आज वो अपनी 98% वैल्यू खो चुका है वो भी इस नोट छपाई की वजह से।

बहुत जल्द दुनिआ एक नई करेंसी से वाकिफ होने जा रही है, इसमें कतई ताज्जुब की बात नहीं होगी अगर लोग Bitcoinको अपनी आधिकारिक करेंसी घोषित कर दें, क्योंकि बिटकॉइन पर किसी सरकार का ज़ोर नहीं हैं, वो लोगों द्वारा तैयार की गई करेंसी है।

Bitcoin महंगाई की समस्या
Bitcoin

और अगर ऐसा होता है तो कैपिटलिज्म के ऊपर सोशलिज्म का सबसे बड़ा प्रहार होगा। तब तक के लिए

सादर नमस्कार

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