Kisan Andolan

Kisan Andolan.. आखिर कृषि कानूनों के खिलाफ क्यों हैं देश के किसान?

नमस्कार!

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जैसा की आप जानते हैं की हम आपके साथ रोचक जानकारियां शेयर करते रहते हैं। इसलिए जो जानकारी हम आपसे आज शेयर कर रहे हैं वह Kisan Andolan से जुड़ी है। इस कड़ी में हम किसान आंदोलन की हर उस बात से पर्दा उठाएंगे जो शायद ही आपको पता हो, तो बने रहिये हमारे साथ। 

किसी देश की सरकार के कार्यकाल में ऐसे क्षण आते हैं जब उसे अपने नागरिकों को कुछ इस तरह की प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता होती है जो उनकी कार्य प्रणाली के महत्व को दर्शाता है।

आज देश की राजधानी को अपनी चपेट में लेने वाला किसान विरोध निश्चित रूप से ऐसा ही एक है। 
 

Kisan Andolan

 

इसके परिणामस्वरूप : दिल्ली के दरवाजे के बाहर मानवता के समंदर में लाखों की संख्या में लोग शामिल हैं। जैसा की आप जानते हैं कि भारत देश का प्रत्येक नागरिक कहीं न कहीं कृषि से जुड़ा है।

 इस दृष्टि से देखा जाये तो किसान एक ऐसे मुद्दे को लेकर सरकार के सामने खड़े हैं जो कम से कम 110 मिलियन लोगों के जीवन को प्रभावित करता है। 

 

सीमाओं पर बैठा किसान 

 
पिछले कुछ महीनों में, किसानों ने दिल्ली की कुछ सीमाओं पर जैसे  सिंघु बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर और गाजीपुर बॉर्डर में डेरा डाला है और अपना विरोध जारी रखा है।

उन्होंने जाड़ों  की सर्दी , भीषण गर्मी, बारिश और नोवेल कोरोनावायरस रोग (COVID-19) की घातक दूसरी लहर का सामना भी सड़कों पर रह कर  किया है। यहाँ तक की प्रदर्शन कर रहे अनेक किसानों ने अपनी जान तक गंवा दी है।  

यह तो आप जानते ही होंगे कि देश के किसान कृषि कानूनों को रद्द किए जाने की मांग निरंतर कर रहे हैं।  उनका कहना है कि ये क़ानून उनकी जिंदगियों को बर्बादी की ओर ले जायेंगे।  दूसरी तरफ सरकार इन कानूनों को किसानों के जीवन में सुधार बता रही है। 

चलिए हम इस Kisan Andolan से जुड़े तथ्यों पर प्रकाश डालते है और आपको बताते हैं कि क्यों लाखों लोग अपना घर बार छोड़ कर सरकार के बनाये कानूनों का इस कदर इतने लम्बे समय से विरोध कर रहे हैं।

इतना ही नहीं हम आपको यह भी बताएंगे कि क्या सरकार के बनाये इन कानूनों का असर केवल किसानों पर ही पड़ेगा।  

 

 

अनदेखी के खिलाफ चेतावनी 

 
कई अध्ययनों में पाया गया है कि भारत में आधे से भी अधिक कृषक समुदाय कर्ज में है।  यह एक प्रमुख कारण है कि हर साल 10,000 से अधिक किसान अपनी जान की आहुति देने को मजबूर हैं।

आत्महत्या से इन मौतों की दृढ़ता, जो अपने आप में एक विकृत व स्वीकार न की जा सकने वाली वास्तविकता का संकेत देती है।

किसी किसान की आत्महत्या अब इतनी सामान्य हो गई है कि वे हल्के से समाचारों को उछाल देते हैं। यहां ट्रिगर चेतावनियों की कोई आवश्यकता नहीं है।

 

हमारे इस देश में कितनी सरकारें आयी, और हर सरकार के समक्ष “कर्ज़ मुक्ति” का नारा कई पीढ़ियों से उठाया गया है।  आज इस Kisan Andolan ने ऐसा रूप बहरे कानों पर गिरने के लिए लिया है ।

विरोध करने वालों में से अधिकतर उन दिग्गजों के बच्चे और पोते हैं जिन्होंने भारतीय राज्य की ताकत के खिलाफ इसी तरह के विरोध का नेतृत्व किया है। शायद यही कारण है कि इतनी मुश्किलें आने के बाद भी किसानों का हौसला नहीं डगमगाया है।  

 

चलिए अब आपको बताते हैं कि सरकार द्वारा बनाये गए तीन कानूनों के विरोध में क्यों हैं किसान। 

 

किसानों के MSP खत्म होने का डर

 
सरकार द्वारा बनाये गए कृषि कानूनों के अंतर्गत किसानों को अपनी उपज मंडी के बाहर बेचने का अधिकार है।  इस कानून सरकार का यह तर्क है कि किसानों को कारोबार के लिया नए अवसर मिलेंगे।

किन्तु किसानों को यह डर है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price) को खत्म कर देगी जिससे किसान कारोबारियों द्वारा तय मूल्यों पर अपनी फसल बेचने को मजबूर हो जायेंगे। 

 

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के अनुसार, सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानून में शामिल करें।  यदि कोई एमएसपी से काम कीमत पर फसल ख़रीदे तो इसे क़ानूनी अपराध माना जाये।

बता दें कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) किसी भी फ़सल का वह न्यूनतम मूल्य होता है, जिस के अंतर्गत सरकार किसानों से अनाज खरीदती है।  हालांकि केंद्र सरकार पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी है कि एमएसपी समाप्त नहीं किया जाएगा।

लेकिन किसान कथित तौर पर यह बात मानने को तैयार नहीं हैं और निरंतर मांग कर रहे हैं कि सरकार कानून में इसे शामिल करे कि MSP खत्म नहीं किया जायेगा। 

 

 

कॉरपोरेट के हाथों में जाने का डर

 
किसानों को यह डर सता रहा है कि जब मंडीयां पूरी तरह से कमजोर हो जाएगी तो किसानों को न चाहते हुए भी पूँजीपतिओं को अपनी फसलें बेचने पर मजबूर होना पड़ेगा। 

इस तरह से कृषि धीरे-धीरे कॉर्पोरेट घरानों के हाथों में चली जाएगी। यदि ऐसा हुआ तो पूंजीपति ज्यादा से ज्यादा फायदा कमाने के लालच में किसानों का खून चूस लेंगे और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से कम कीमतों पर खरीदारी करेंगे।

इसीलिए किसान इस बात पे अड़े हैं कि सरकार एमएसपी (MSP) सुनिश्चित करे। 

 

अदालत में जाने का हक़ छीना 

 
सरकार के बनाये कानूनों ने देश के किसानों से अदालत में जाने का हक़ भी छीन लिया है।   नए कृषि कानूनों में बताया गया है कि जब किसानों व कंपनियों के बीच विवाद होगा तो वे कोर्ट नहीं जा सकते। 

इसके विपरीत उन्हें SDM के पास अपील करनी होगी। यदि वहां भी विवाद नहीं सुलझता है तो वे DM के पास जा सकते हैं। इसपर  किसानों का कहना है कि उन्हें डीएम और एसडीएम पर भरोसा नहीं है।

उनकी मांग है कि कोई भी विवाद होने पर उन्हें कोर्ट जाने की छूट मिले, यह उनका हक़ है। 

 

जमाखोरी का डर

 
नए कृषि कानूनों की वजह से किसानो को जमाखोरी का डर सता रहा है।  उनका कहना है कि जैसे सरकार पूंजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के हाथों में कृषि क्षेत्र की बागडोर सौंप रही है इससे जमाखोरी को बढ़ावा मिलेगा।

छोटे किसानों का शोषण किया जायेगा और उनको फसल सस्ते दामों पर बेचनी पड़ेगी।  इसलिए किसानों की मांग है कि सरकार जमाखोरी को लेकर कानूनों मैं प्रावधान करे।  

 

मंडियां खत्म होने डर 

 
किसानों का सबसे बड़ा डर यह है कि जैसे ही कॉर्पोरेट की दुनिया से कृषि जुड़ जाएगी मंडियां पूर्ण रूप से तबाह हो जाएगी। इस बात पर मंडियों के आढ़ाती भी किसानों का साथ दे रहे हैं।

किसानो का कहना है की जब मंडियां होंगी तभी तो किसान अपनी फसल बेच पायेगा वर्ना उसे दरबदर भटकना पड़ेगा।  पूंजीपति इस बात का भरपूर फायदा उठाएंगे और किसानो को सस्ते दामों में लूट लेंगे।

मंडियों में 6 से 7 फ़ीसदी तक टैक्स लगता है इसलिए किसानो की मांग है की टैक्स व्यवस्ता को भी दुरुस्त किया जाये। हालांकि सरकार ने मंडियों को समाप्त करने की बात नए कानूनों में जाहिर नहीं की  है।   

 

 

किसानों की दशा 

 
यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि Kisan Andolan कर रहे किसानों की हालत बहुत दयानिअ है।  दुर्भाग्य से, केंद्र सरकार, हरियाणा व उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार की अब तक की प्रतिक्रिया अत्यधिक कटु और दमनकारी थी।

आंदोलन करने वाले किसानों को “देशद्रोही” और “खालिस्तानी” के रूप में चिन्हित किया गया। हरियाणा सरकार ने किसानों को दिल्ली जाने से रोकने के लिए सीमाओं को सील कर दिया, बैरिकेड्स लगा दिए, सड़कें खोद डाली और हत्या के प्रयास, दंगा करने, सरकारी काम में बाधा डालने आदि का आरोप लगाने वाले कई प्रदर्शनकारियों को जेल में डाल दिया। इन्हीं बातों ने  किसानों को सरकार से दूर कर दिया और उन्हें उग्र कर दिया ।

 

किसी भी सभ्य सरकार से यह उम्मीद नहीं की जाती है कि वह उन प्रदर्शनकारियों के साथ इस तरह का व्यवहार करे जो शांतिपूर्ण तरीके से अपने संवैधानिक अधिकार का प्रयोग करना चाहते हैं। 

 

क्या कहता है किसान 

 
देश के किसान कहते हैं कि हम हमेशा सब्सिडी नहीं चाहते हैं। सरकार को हम पर दया करने की कोई आवश्यकता नहीं है। हमें आत्मनिर्भर बनाने के लिए कोई  सरकार का कोई सपोर्ट, कोई  सिस्टम नहीं है बल्कि हमारी आवाज़ को दबाने की कोशिश की जा रही है। 

किसानों का कहना है कि हम इसी मिट्टी में पैदा हुए हैं और इस देश के नागरिक हैं, इसलिए, किसान भारत सरकार से अपनी मांगों को स्वीकार करने का आग्रह करते हैं क्योंकि वे उचित और वैध हैं।

 

 

तो ये थी Kisan Andolan  से जुड़ी सारी  जानकारी, यदि आपको यह ब्लॉग अच्छा लगा तो शेयर करें और हमारे फेसबुक पेज moneysarthi को लाइक करना न भूलें ताकि आपके अपने इस तरह की जानकारी का लाभ प्राप्त कर सकें। 

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